अरे कोई मुझे बताये कि हम गांधीजी के देश में जी रहे हैं या हम हिटलर के देश में जी रहे जहाँ मासूम लोगो को अपनी आवाज़ उठाने पर हिंसक कार्यवाही कि जाती है जहाँ उनके शांतिपूर्ण आंदोलनों को बर्बरतापूर्वक कुचला जाता जाता है?कितनी शर्म कि बात है जिस विधेयक को क़ानूनी जमा पहनाने का कार्य विधायिका को करना होता है वहां यह कार्य जनता आंदोलनों के माध्यम से कर रही है . बात चाहे आना हजारे कि हो या बाबा रामदेव जी कि.. मुद्दे तो हम्ही के के हैं न . फिर क्यूँ सरकार हिंसा पर उतारू हुई? एक तरफ दिग्विजय सिंह बाबा को ठग बताते हैं वहीँ उनके कुछ मंत्री बाबा को मानना कलिए जाते हैं..कितनी शर्मनाक घटना थी कल कि भिखे सोते हुए और मासूम लोगो पर आधीरात को पुलिस का कहर टूटता है..एक तरफ राहुल बाबा भत्ता पारसोल जाकर ये कहते कि मुझे भारतीय होने पर शर्म आती है वहीँ आज वो बंद कमरे में जा छुपे हैं ये हमारे देश के युवा नेताओं कि अवसरवादिता नहीं है?